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लेखनी कहानी -20-Dec-2022

अखिल विश्व में ज्ञान तुम्हारा,तुमको ही ललकार रहा।
कश्यप भृगु अंगिरा अंगिरस,इनका जो उपकार रहा।
उनकी शिक्षा पड़ी सिसकती,संस्कृति के गलियारों में।
अपकारों की इस आँधी में,उपकारी चित हार रहा।
कोई कौशल कुशल नही है,धूर्त अतिक्रमण कारी से।
क्षुद्र विधर्मी कुटिल बुद्धि का,जिसमे कृष संस्कार रहा।
आज सिखाता शास्त्र हमे वह,जो शुचिता विपरीत कहे।
चले कहाँ से कहाँ आ गए,नाम मात्र आधार रहा।
तीक्ष्ण दन्त नख तनिक दिखाओ,झटक अयाल तनो फिर से।
रँगे सियारों का मर्दन कर,सुभग भविष्य निहार रहा।
परशुवंसजो जागो जागो,खुशी विकल संचारी है, 
चेतन मन के शुभ्र निकेतन,भूत तुम्हे धिक्कार रहा।

-अभिलाषा देशप

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4 Comments

Gunjan Kamal

21-Dec-2022 09:18 PM

शानदार

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Muskan khan

20-Dec-2022 05:42 PM

Shandar 👍🌺

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Sachin dev

20-Dec-2022 04:28 PM

बिल्कुल सही

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